| धीरे-धीरे चल री पवन मन आज है अकेला रे |
| पलकों की नगरी में सुधियों का मेला रे |
| धीरे चलो री आज नाव ना किनारा है |
| नयनो के बरखा में याद का सहारा है |
| धीरे-धीरे निकल मगन-मन, छोड़ सब झमेला रे |
| पलकों की नगरी में सुधियों का मेला रे |
| होनी को रोके कौन, वक्त से बंधे हैं सब |
| राह में बिछुड़ जाए, कौन जाने कैसे कब |
| पीछे मींचे आँख, संजोये दुनिया का रेला रे |
| पलकों की नगरी में सुधियों का मेला रे |
| तेज जो चले हैं माना दुनिया से आगे हैं |
| किसको पता है किन्तु, कितने अभागे हैं |
| वो क्या जाने महका कैसे, आधी रात बेला रे |
| पलकों की नगरी में सुधियों का मेला रे |
0 Comments